उसने अपनी घड़ी देखी। रात के दो बज रहे थे। अभी भी पंद्रह मिनट बाक़ी थे। वह बेचैन हो रही थी। इस छोटे से रेलवे स्टेशन पर इतनी रात गए कोई गाड़ी नहीं आती थी। प्लेटफॉर्म पर मद्धम पीली रोशनी पसरी हुई थी। सन्नाटे में झींगुरों की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं। प्लेटफॉर्म के एक छोर पर लोहे के पीले बोर्ड पर काले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— “रुधिरपुर”। सुनैना घबरा रही थी, लेकिन फिर भी वह हिम्मत से काम ले रही थी। बेंच पर बैठे हुए उसने अपना ध्यान घड़ी पर रखा था। उसके लिए ये पंद्रह मिनट भी बहुत लंबे थे। यह मौक़ा साल में एक बार ही मिल सकता था, और इसलिए यहाँ से घबराकर लौट जाना कोई विकल्प नहीं था।
ठीक 2:15 बजे, यकायक कुछ दूरी पर एक ट्रेन आती दिखी। यह बड़े आश्चर्य की बात थी क्योंकि सुनैना ने इस ट्रेन की कोई आवाज़ नहीं सुनी थी। ट्रेन बड़ी पुरानी मालूम पड़ती थी। इंजन कोयले से चलने वाला था और उससे घना काला धुआँ निकल रहा था। ऐसी ट्रेनें आधुनिक समय में दिखाई नहीं देतीं। सुनैना को विश्वास हो चला कि बुढ़िया ने ठीक ही कहा था। यह ट्रेन साधारण नहीं थी, न ही इसका गंतव्य साधारण था। सुनैना के ठीक सामने एक डिब्बा रुका। अंदर से एक यूनिफॉर्मधारी बूढ़े लेकिन बलिष्ठ व्यक्ति ने दरवाज़ा खोला और कहा— "अंदर आ जाओ"। सुनैना को यह भी नहीं पता था कि इस यात्रा से लौटकर आना होगा भी या नहीं, लेकिन ग्लानि व्यक्ति को मृत्यु भी स्वीकार करा देती है। उसने एक गहरी साँस ली और ट्रेन में चढ़ गई।
डिब्बा पूरी तरह ख़ाली था, सिर्फ़ उस एक बूढ़े के अलावा। वह नीली रोशनी से भरे डिब्बे के गलियारे में आगे-आगे चल रहा था और सुनैना उसके पीछे-पीछे। सुनैना ने देखा कि सभी सीटों पर एक-एक बक्सा रखा हुआ था जिस पर ताला लगा था। कुछ आगे चलने के बाद उस बूढ़े व्यक्ति ने सुनैना को एक सीट पर बैठने को कहा और उससे पूछा— "बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है?" सुनैना को उस बुढ़िया के साथ हुआ संवाद याद हो आया।
(दो महीने पहले)—
रुधिरपुर स्टेशन के एक सुनसान प्लेटफॉर्म की बेंच पर बैठी सुनैना अपनी हथेलियों में अपना मुँह छुपाए रो रही थी। तभी एक बूढ़ी महिला ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा— "जो हो गया उसे भूल जा"। सुनैना ने सिर उठाकर बुढ़िया को देखा और थोड़ी असमंजस में पड़ गई। उसने उस बुढ़िया से कहा— "क्या?" बुढ़िया— "जो हो गया उसे भूल जा। जो चला गया वह तो चला गया"।
सुनैना— "लेकिन आपको कैसे पता?"
बुढ़िया— "वह मत पूछ। बस भूल जा"।
सुनैना फूट-फूटकर रोने लगी और बोली— "ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊँगी। बल्कि मैं तो अब जी भी नहीं सकती। यहीं ट्रेन से कटकर जान दे दूँगी।"
बुढ़िया— "अगर तू मरने को भी तैयार है, तो एक रास्ता है"।
सुनैना का रोना एकदम से रुक गया। उसकी उत्सुकता जागी— "कैसा रास्ता? आप क्या कह रही हैं?"
बुढ़िया— "बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है?"
किसी रहस्यमयी कारण से सुनैना के मन की दुविधा ख़त्म हो गई। सिर्फ़ इस एक प्रश्न से। जैसे कि उसके मन के किसी गहरे कोने में मृत पड़ी उम्मीद में किसी ने जान फूँक दी हो। उसे ख़ुद अंदाज़ा नहीं था कि ऐसी कोई उम्मीद भीतर कहीं है भी। वह बोल पड़ी— "क्या क़ीमत है बीते हुए कल को वापस पाने की?"
बुढ़िया ज़ोर से हँस पड़ी, पागलों जैसे। फिर उसने मुस्कुराकर कहा— "आज — और क्या?", और फिर हँसने लगी।
इससे पहले कि सुनैना कुछ पूछ पाती, बुढ़िया ने आगे कहा, "ठीक दो महीने बाद इसी प्लेटफॉर्म पर रात के 2:15 पर एक ख़ास ट्रेन आएगी। उसमें बैठ जाना। नहीं तो अगले एक साल तक वह ट्रेन नहीं मिलेगी"।
"बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है? जल्दी बताओ", ट्रेन के यूनिफॉर्मधारी वृद्ध ने ऊँचे स्वर में कहा। सुनैना का ध्यान वापस इस क्षण पर आया। उसने तुरंत कहा— "आज!! बीते कल को पाने की क़ीमत मेरा आज है।"
यूनिफॉर्मधारी उसे कुछ क्षण एकटक देखता रहा। फिर मुस्कुराया और बोला — “सही जवाब। इस सीट पर बैठ जाओ।”
कुछ देर बाद वह वैसा ही बक्सा लेकर आया जैसा कि सुनैना ने दूसरी सीटों पर देखा था। फर्क बस इतना था कि यह बक्सा खुला हुआ था।
उसने बक्सा दोनों हाथों में उठाया, आँखें बंद कीं और सुनैना की ओर ऊँचे स्वर में कहा — “तैयार हो जाओ।”
फिर उसी अवस्था में, बड़ी स्थिरता से अपने स्वामी का आह्वान करते हुए बोला —
इतना कहते ही सुनैना ने देखा कि आसपास का दृश्य बदलने लगा। डिब्बे की नीली रोशनी धुंधली पड़ने लगी। दोनों ओर अमावस्या जैसा घुप्प अँधेरा फैलने लगा। आवाज़ें जैसे धीरे-धीरे दूर जाती जा रही थीं। उस बक्से में भी कुछ प्रवेश कर रहा था — किंतु क्या? वह यूनिफॉर्मधारी बूढ़ा भी धुएँ के बादल-सा बनकर विलीन होने लगा।
और अगले ही क्षण सुनैना को लगा कि उसके होश भी धीरे-धीरे साथ छोड़ रहे हैं। फिर यकायक सब कुछ काला हो गया।
जब सुनैना को होश आया, तो उसने पाया कि वह किसी अजीब जगह पर है। यह कौन-सी जगह है? सब कुछ ख़ाली-ख़ाली सा।
वह देख सकती थी, पर देखने को कुछ नहीं था।
वह सुन सकती थी, पर सुनने को कुछ नहीं था।
वह बोलना चाहती थी, पर शब्द जैसे उसके पास पहुँच ही नहीं रहे थे।
वह छू सकती थी, पर छूने के लिए वहाँ कुछ था ही नहीं।
अचानक उसके भीतर एक और सवाल उठा — उसका शरीर कहाँ गया?
और अगर शरीर ही नहीं है, तो यह अनुभव कौन कर रहा है? क्या यही मृत्यु है?
“यह मृत्यु नहीं है। यह शून्य है।”, किसी ने कहा।
नहीं — यह आवाज़ उसने सुनी नहीं थी। बस उसे पता चल गया था कि यह कहा गया है, जैसे कोई सीधे उसके विचारों में बोल रहा हो। यह अनुभव सुनैना के लिए अत्यंत विचित्र और डरावना था।
"शून्य?", उसने पूछा।
"हाँ, शून्य। यह काल से परे है। इसलिए यहाँ कोई भी अपने स्थूल शरीर के साथ नहीं आ सकता।”
“मुझे तो अपने अतीत में जाना था।” सुनैना की बेचैनी बढ़ रही थी।
“शून्य को सब ज्ञात है— यह भी कि तुमने कालेश्वर को अपना वर्तमान भेंट कर दिया, और यह भी कि तुम अतीत के किस क्षण में प्रवेश करने आई हो।"
सुनैना चुप रही।
"शून्य में मौन का कोई अर्थ नहीं। यहाँ सब कुछ व्यक्त है। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर तुम्हें उस क्षण में ले जाएगा।"
"हमेशा हम तुम्हारी वजह से ही लेट होते हैं" - सुधीर चिड़चिड़ा कर बोला। "जब तुम्हें पता है कि दूर जाना है तो इतना लेट क्यों कर दिया? देखो अब अंधेरा भी हो गया है।"
"मैं जब तैयार होती हूँ तो तुम मुझे बार बार ये घड़ी ना दिखाया करो। अगर इतना हल्ला गुल्ला नहीं करते तो मैं जल्दी तैयार हो जाती" - सुनैना ने तपाक से उत्तर दिया।
"हाँ सब मेरी ही गलती होती है" - सुधीर ने तंज कसा।
"अच्छा अब ग़ुस्सा छोड़ो। यहाँ आगे से लेफ्ट ले लो, एक शॉर्टकट दिख रहा है। जल्दी पहुँच जाएँगे" - सुनैना ने सुझाया।
"नहीं नहीं। मुझे नहीं पता वह रास्ता। झाड़ी जंगल के बीच में पता नहीं कौन सा रास्ता है। मैं नहीं जाऊँगा" - सुधीर ने सावधान हो कर कहा।
"तुम इतना ही डरते हो तो तुम हटो और मुझे स्टीयरिंग सँभालने दो। मैं चला के पहुँचा दूँगी तुम्हें टाइम पर" - सुनैना अड़ी रही।
पत्नी द्वारा दी गई चुनौती से सुधीर के अहं को चोट पहुँची। उसने तुरंत कार बाईं ओर मोड़ दी।
"शाबाश मेरे शेर!" - सुनैना ने मुस्कुराते हुए सुधीर की तारीफ़ में कहा।
अचानक कार के नीचे कुछ ज़ोर से टकराया और गाड़ी बेकाबू होकर हिचकोले खाने लगी। सुनैना ने सीट बेल्ट नहीं पहनी थी, वह गाड़ी के संवेग के कारण काँच तोड़ती हुई कार से दूर जा गिरी। सुधीर ने सीट बेल्ट पहन रखी थी। गाड़ी जैसे ही रुकी, एक वृक्ष की भारी शाखा उस पर गिर गई। सुधीर गाड़ी के अंदर ही दब कर रह गया। सुनैना ज़ोर से चिल्लायी - "सुधीर!!!!!!!!"
“अब शून्य तुम्हें उसी क्षण में स्थूल शरीर के साथ पुनः स्थापित करेगा।” उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से भावुक हुई सुनैना को संवाद प्राप्त हुआ, और फिर दृश्य बदल गया।
"हमेशा हम तुम्हारी वजह से ही लेट होते हैं" - सुधीर चिड़चिड़ा कर बोला। "जब तुम्हें पता है कि दूर जाना है तो इतना लेट क्यों कर दिया? देखो अब अंधेरा भी हो गया है।"
इस बार सुनैना अवाक् थी। कुछ कह नहीं पा रही थी। उसने पिछले कुछ क्षणों में ऐसी विचित्र घटनाओं का अनुभव कर लिया था, कि अब उसे कल्पना और यथार्थ में अंतर कर पाना मुश्किल लग रहा था। उसने धीमे से कहा - "सॉरी! आगे से ध्यान रखूँगी।"
"सॉरी? तुम ठीक तो हो?" सुधीर को बड़ा आश्चर्य हुआ। सुनैना मुस्कुरा दी।
"मैडम ने गलती मान कर सॉरी बोल दिया। लगता है आज मैडम क्लेश के मूड में नहीं हैं। चलो अच्छा है" - सुधीर ने हँसते हुए कहा।
दोनों सुधीर के एक दोस्त की हाउस पार्टी में जा रहे थे। वे वहाँ पहुँचे - सही सलामत। सुनैना के चेहरे पर एक गहरी शांति झलक रही थी। वह प्रसन्न थी। वह सुधीर के साथ ही रही। खाना पीना, हँसना, गाना सब किया। सुधीर ने सुनैना से ऐसा स्नेह पाया कि उसकी भी ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी। दोनों ने कपल डांस किया और ऐसा किया कि सब देखते रह गए। दोनों को अपने आस पास के वातावरण का कोई ख़याल नहीं था। बल्कि, एक बार तो सुधीर का सर भी दरवाज़े से टकरा गया।
"अबे! यह दरवाज़ा यहाँ किसने लगा दिया बे?" - सुधीर ने सर सहलाते हुए मस्ती में कहा। सब ज़ोर से हँस पड़े। सुनैना भी हँसी।
अगले दिन अस्पताल में।
"सॉरी मैडम। आपके पति अब नहीं रहे" - डॉक्टर ने सुनैना से कहा।
"पर ये तो कल ही नाच गा रहे थे। आज भी ठीक थे। पता नहीं कैसे अचानक से चक्कर खा कर गिर पड़े। इन्हें कोई बीमारी थोड़ी ना थी। यह तो संभव ही नहीं है। आप क्या बकवास कर रहे हैं?" - सुनैना के स्वर में दुख से ज़्यादा क्रोध था। यह सब क्या चल रहा था?
"मैडम इनके ब्रेन में खून का थक्का जम गया था। इसे मेडिकल टर्म्स में सबड्यूरल हैमाटोमा कहते हैं। क्या इन्हें सर पर कोई चोट लगी थी? छोटी या बड़ी?" - डॉक्टर ने पूछा।
सुनैना को कल रात की चोट याद आयी। सुनैना अस्पताल से बाहर भागी। वह उसी रुधिरपुर स्टेशन पर पहुँच गई जहां उसे वह बुढ़िया मिली थी। वहाँ जा कर चिल्लाने लगी, "अम्मा कहाँ हो तुम?"। "अम्मा कहाँ हो? अभी मेरे सामने आओ।"
स्टेशन पर कुछ लोगों ने उसकी तरफ़ देखा पर उसे पागल समझ कर अनदेखा कर दिया। जब बहुत चिल्लाने पर भी वह बुढ़िया नहीं आयी, तब सुनैना फिर वहीं बेंच पर बैठ कर रोने लग गई।
"मुझे क्या बुला रही है? तू तो ख़ुद अपनी इच्छा से यहाँ आई थी ना? क्या मिला यहाँ आ कर?"
सुनैना - "तुमने तो कहा था बीते कल में जा सकती हो। तो मुझे लगा -"
"क्या लगा? यही कि इतिहास बदलने से तेरा दुख दूर हो जायेगा?" - बुढ़िया ने कठोर स्वर में पूछा।
उसने आगे कहा - "यहाँ प्रकृति की महा-लीला चल रही है। तू कौन है? और यह सब लोग कौन हैं? यहाँ जन्म-मरण का खेल तो समय के शुरुआत से ही चला आ रहा है। यह घटनाएँ उसी महा-लीला का हिस्सा हैं। तू एक घटना से बचेगी तो दूसरी तुझ पर आ बरसेगी। जैसे इस महा-लीला में तुझे मुस्कुराहट मिलती है, वैसे ही पीड़ा भी मिलती है। प्रकृति घटनाएँ देती है… सुख या दुख तू ख़ुद चुनती है।"
"तो मैं अब क्या करूँ अम्मा?" - सुनैना ने रोते हुए कहा।
"अंदर झांक। वहीं पर ऐसा कुछ मिलेगा जो कभी नहीं बदलता। वह जो तेरे सारे दुख दूर कर देगा। जब तक जीवन है, तक तक इस महा-लीला की घटनाएँ हैं। इनके डर से जीवन जीना नहीं छोड़ देते। इनको स्वीकार कर और जा, अपना जीवन जी ले। चिंता छोड़ और उन्मुक्त हो जा। यही एक सूत्र है।"
सुनैना के आंसू थम जाते हैं। वह चुपचाप अस्पताल की तरफ़ चल देती है। बीते हुए कल के प्रयास में उसने अपने आज में प्रवेश कर लिया था।