Thursday, 19 March 2026

काल निर्णय

 उसने अपनी घड़ी देखी। रात के दो बज रहे थे। अभी भी पंद्रह मिनट बाक़ी थे। वह बेचैन हो रही थी। इस छोटे से रेलवे स्टेशन पर इतनी रात गए कोई गाड़ी नहीं आती थी। प्लेटफॉर्म पर मद्धम पीली रोशनी पसरी हुई थी। सन्नाटे में झींगुरों की आवाज़ें साफ़ सुनाई दे रही थीं। प्लेटफॉर्म के एक छोर पर लोहे के पीले बोर्ड पर काले रंग से बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था— “रुधिरपुर”। सुनैना घबरा रही थी, लेकिन फिर भी वह हिम्मत से काम ले रही थी। बेंच पर बैठे हुए उसने अपना ध्यान घड़ी पर रखा था। उसके लिए ये पंद्रह मिनट भी बहुत लंबे थे। यह मौक़ा साल में एक बार ही मिल सकता था, और इसलिए यहाँ से घबराकर लौट जाना कोई विकल्प नहीं था।

ठीक 2:15 बजे, यकायक कुछ दूरी पर एक ट्रेन आती दिखी। यह बड़े आश्चर्य की बात थी क्योंकि सुनैना ने इस ट्रेन की कोई आवाज़ नहीं सुनी थी। ट्रेन बड़ी पुरानी मालूम पड़ती थी। इंजन कोयले से चलने वाला था और उससे घना काला धुआँ निकल रहा था। ऐसी ट्रेनें आधुनिक समय में दिखाई नहीं देतीं। सुनैना को विश्वास हो चला कि बुढ़िया ने ठीक ही कहा था। यह ट्रेन साधारण नहीं थी, न ही इसका गंतव्य साधारण था। सुनैना के ठीक सामने एक डिब्बा रुका। अंदर से एक यूनिफॉर्मधारी बूढ़े लेकिन बलिष्ठ व्यक्ति ने दरवाज़ा खोला और कहा— "अंदर आ जाओ"। सुनैना को यह भी नहीं पता था कि इस यात्रा से लौटकर आना होगा भी या नहीं, लेकिन ग्लानि व्यक्ति को मृत्यु भी स्वीकार करा देती है। उसने एक गहरी साँस ली और ट्रेन में चढ़ गई।

डिब्बा पूरी तरह ख़ाली था, सिर्फ़ उस एक बूढ़े के अलावा। वह नीली रोशनी से भरे डिब्बे के गलियारे में आगे-आगे चल रहा था और सुनैना उसके पीछे-पीछे। सुनैना ने देखा कि सभी सीटों पर एक-एक बक्सा रखा हुआ था जिस पर ताला लगा था। कुछ आगे चलने के बाद उस बूढ़े व्यक्ति ने सुनैना को एक सीट पर बैठने को कहा और उससे पूछा— "बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है?" सुनैना को उस बुढ़िया के साथ हुआ संवाद याद हो आया।

(दो महीने पहले)—

रुधिरपुर स्टेशन के एक सुनसान प्लेटफॉर्म की बेंच पर बैठी सुनैना अपनी हथेलियों में अपना मुँह छुपाए रो रही थी। तभी एक बूढ़ी महिला ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा— "जो हो गया उसे भूल जा"। सुनैना ने सिर उठाकर बुढ़िया को देखा और थोड़ी असमंजस में पड़ गई। उसने उस बुढ़िया से कहा— "क्या?" बुढ़िया— "जो हो गया उसे भूल जा। जो चला गया वह तो चला गया"

सुनैना— "लेकिन आपको कैसे पता?"

बुढ़िया— "वह मत पूछ। बस भूल जा"

सुनैना फूट-फूटकर रोने लगी और बोली— "ज़िंदगी भर नहीं भूल पाऊँगी। बल्कि मैं तो अब जी भी नहीं सकती। यहीं ट्रेन से कटकर जान दे दूँगी।"

बुढ़िया— "अगर तू मरने को भी तैयार है, तो एक रास्ता है"

सुनैना का रोना एकदम से रुक गया। उसकी उत्सुकता जागी— "कैसा रास्ता? आप क्या कह रही हैं?"

बुढ़िया— "बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है?"

किसी रहस्यमयी कारण से सुनैना के मन की दुविधा ख़त्म हो गई। सिर्फ़ इस एक प्रश्न से। जैसे कि उसके मन के किसी गहरे कोने में मृत पड़ी उम्मीद में किसी ने जान फूँक दी हो। उसे ख़ुद अंदाज़ा नहीं था कि ऐसी कोई उम्मीद भीतर कहीं है भी। वह बोल पड़ी— "क्या क़ीमत है बीते हुए कल को वापस पाने की?"

बुढ़िया ज़ोर से हँस पड़ी, पागलों जैसे। फिर उसने मुस्कुराकर कहा— "आज — और क्या?", और फिर हँसने लगी।

इससे पहले कि सुनैना कुछ पूछ पाती, बुढ़िया ने आगे कहा, "ठीक दो महीने बाद इसी प्लेटफॉर्म पर रात के 2:15 पर एक ख़ास ट्रेन आएगी। उसमें बैठ जाना। नहीं तो अगले एक साल तक वह ट्रेन नहीं मिलेगी"


"बीते हुए कल को वापस पाने की क़ीमत क्या है? जल्दी बताओ", ट्रेन के यूनिफॉर्मधारी वृद्ध ने ऊँचे स्वर में कहा। सुनैना का ध्यान वापस इस क्षण पर आया। उसने तुरंत कहा— "आज!! बीते कल को पाने की क़ीमत मेरा आज है।"

यूनिफॉर्मधारी उसे कुछ क्षण एकटक देखता रहा। फिर मुस्कुराया और बोला — “सही जवाब। इस सीट पर बैठ जाओ।”

कुछ देर बाद वह वैसा ही बक्सा लेकर आया जैसा कि सुनैना ने दूसरी सीटों पर देखा था। फर्क बस इतना था कि यह बक्सा खुला हुआ था।

उसने बक्सा दोनों हाथों में उठाया, आँखें बंद कीं और सुनैना की ओर ऊँचे स्वर में कहा — “तैयार हो जाओ।”

फिर उसी अवस्था में, बड़ी स्थिरता से अपने स्वामी का आह्वान करते हुए बोला —

                        “कालेश्वराय इदं समर्पयामि!”

इतना कहते ही सुनैना ने देखा कि आसपास का दृश्य बदलने लगा। डिब्बे की नीली रोशनी धुंधली पड़ने लगी। दोनों ओर अमावस्या जैसा घुप्प अँधेरा फैलने लगा। आवाज़ें जैसे धीरे-धीरे दूर जाती जा रही थीं। उस बक्से में भी कुछ प्रवेश कर रहा था — किंतु क्या? वह यूनिफॉर्मधारी बूढ़ा भी धुएँ के बादल-सा बनकर विलीन होने लगा।

और अगले ही क्षण सुनैना को लगा कि उसके होश भी धीरे-धीरे साथ छोड़ रहे हैं। फिर यकायक सब कुछ काला हो गया।

जब सुनैना को होश आया, तो उसने पाया कि वह किसी अजीब जगह पर है। यह कौन-सी जगह है? सब कुछ ख़ाली-ख़ाली सा।

वह देख सकती थी, पर देखने को कुछ नहीं था।

वह सुन सकती थी, पर सुनने को कुछ नहीं था।

वह बोलना चाहती थी, पर शब्द जैसे उसके पास पहुँच ही नहीं रहे थे।

वह छू सकती थी, पर छूने के लिए वहाँ कुछ था ही नहीं।

अचानक उसके भीतर एक और सवाल उठा — उसका शरीर कहाँ गया?

और अगर शरीर ही नहीं है, तो यह अनुभव कौन कर रहा है? क्या यही मृत्यु है?

“यह मृत्यु नहीं है। यह शून्य है।”, किसी ने कहा।

नहीं — यह आवाज़ उसने सुनी नहीं थी। बस उसे पता चल गया था कि यह कहा गया है, जैसे कोई सीधे उसके विचारों में बोल रहा हो। यह अनुभव सुनैना के लिए अत्यंत विचित्र और डरावना था।

"शून्य?", उसने पूछा।

"हाँ, शून्य। यह काल से परे है। इसलिए यहाँ कोई भी अपने स्थूल शरीर के साथ नहीं आ सकता।”

“मुझे तो अपने अतीत में जाना था।” सुनैना की बेचैनी बढ़ रही थी।

“शून्य को सब ज्ञात है— यह भी कि तुमने कालेश्वर को अपना वर्तमान भेंट कर दिया, और यह भी कि तुम अतीत के किस क्षण में प्रवेश करने आई हो।"

सुनैना चुप रही।

"शून्य में मौन का कोई अर्थ नहीं। यहाँ सब कुछ व्यक्त है। तुम्हारा सूक्ष्म शरीर तुम्हें उस क्षण में ले जाएगा।"


"हमेशा हम तुम्हारी वजह से ही लेट होते हैं" - सुधीर चिड़चिड़ा कर बोला। "जब तुम्हें पता है कि दूर जाना है तो इतना लेट क्यों कर दिया? देखो अब अंधेरा भी हो गया है।"

"मैं जब तैयार होती हूँ तो तुम मुझे बार बार ये घड़ी ना दिखाया करो। अगर इतना हल्ला गुल्ला नहीं करते तो मैं जल्दी तैयार हो जाती" - सुनैना ने तपाक से उत्तर दिया।

"हाँ सब मेरी ही गलती होती है" - सुधीर ने तंज कसा।

"अच्छा अब ग़ुस्सा छोड़ो। यहाँ आगे से लेफ्ट ले लो, एक शॉर्टकट दिख रहा है। जल्दी पहुँच जाएँगे" - सुनैना ने सुझाया।

"नहीं नहीं। मुझे नहीं पता वह रास्ता। झाड़ी जंगल के बीच में पता नहीं कौन सा रास्ता है। मैं नहीं जाऊँगा" - सुधीर ने सावधान हो कर कहा।

"तुम इतना ही डरते हो तो तुम हटो और मुझे स्टीयरिंग सँभालने दो। मैं चला के पहुँचा दूँगी तुम्हें टाइम पर" - सुनैना अड़ी रही।

पत्नी द्वारा दी गई चुनौती से सुधीर के अहं को चोट पहुँची। उसने तुरंत कार बाईं ओर मोड़ दी।

"शाबाश मेरे शेर!" - सुनैना ने मुस्कुराते हुए सुधीर की तारीफ़ में कहा।

अचानक कार के नीचे कुछ ज़ोर से टकराया और गाड़ी बेकाबू होकर हिचकोले खाने लगी। सुनैना ने सीट बेल्ट नहीं पहनी थी, वह गाड़ी के संवेग के कारण काँच तोड़ती हुई कार से दूर जा गिरी। सुधीर ने सीट बेल्ट पहन रखी थी। गाड़ी जैसे ही रुकी, एक वृक्ष की भारी शाखा उस पर गिर गई। सुधीर गाड़ी के अंदर ही दब कर रह गया। सुनैना ज़ोर से चिल्लायी - "सुधीर!!!!!!!!"

“अब शून्य तुम्हें उसी क्षण में स्थूल शरीर के साथ पुनः स्थापित करेगा।” उस दुर्भाग्यपूर्ण घटना से भावुक हुई सुनैना को संवाद प्राप्त हुआ, और फिर दृश्य बदल गया।

"हमेशा हम तुम्हारी वजह से ही लेट होते हैं" - सुधीर चिड़चिड़ा कर बोला। "जब तुम्हें पता है कि दूर जाना है तो इतना लेट क्यों कर दिया? देखो अब अंधेरा भी हो गया है।"

इस बार सुनैना अवाक् थी। कुछ कह नहीं पा रही थी। उसने पिछले कुछ क्षणों में ऐसी विचित्र घटनाओं का अनुभव कर लिया था, कि अब उसे कल्पना और यथार्थ में अंतर कर पाना मुश्किल लग रहा था। उसने धीमे से कहा - "सॉरी! आगे से ध्यान रखूँगी।"

"सॉरी? तुम ठीक तो हो?" सुधीर को बड़ा आश्चर्य हुआ। सुनैना मुस्कुरा दी।

"मैडम ने गलती मान कर सॉरी बोल दिया। लगता है आज मैडम क्लेश के मूड में नहीं हैं। चलो अच्छा है" - सुधीर ने हँसते हुए कहा।

दोनों सुधीर के एक दोस्त की हाउस पार्टी में जा रहे थे। वे वहाँ पहुँचे - सही सलामत। सुनैना के चेहरे पर एक गहरी शांति झलक रही थी। वह प्रसन्न थी। वह सुधीर के साथ ही रही। खाना पीना, हँसना, गाना सब किया। सुधीर ने सुनैना से ऐसा स्नेह पाया कि उसकी भी ख़ुशी छुपाए नहीं छुप रही थी। दोनों ने कपल डांस किया और ऐसा किया कि सब देखते रह गए। दोनों को अपने आस पास के वातावरण का कोई ख़याल नहीं था। बल्कि, एक बार तो सुधीर का सर भी दरवाज़े से टकरा गया।

"अबे! यह दरवाज़ा यहाँ किसने लगा दिया बे?" - सुधीर ने सर सहलाते हुए मस्ती में कहा। सब ज़ोर से हँस पड़े। सुनैना भी हँसी।


अगले दिन अस्पताल में।

"सॉरी मैडम। आपके पति अब नहीं रहे" - डॉक्टर ने सुनैना से कहा।

"पर ये तो कल ही नाच गा रहे थे। आज भी ठीक थे। पता नहीं कैसे अचानक से चक्कर खा कर गिर पड़े। इन्हें कोई बीमारी थोड़ी ना थी। यह तो संभव ही नहीं है। आप क्या बकवास कर रहे हैं?" - सुनैना के स्वर में दुख से ज़्यादा क्रोध था। यह सब क्या चल रहा था?

"मैडम इनके ब्रेन में खून का थक्का जम गया था। इसे मेडिकल टर्म्स में सबड्यूरल हैमाटोमा कहते हैं। क्या इन्हें सर पर कोई चोट लगी थी? छोटी या बड़ी?" - डॉक्टर ने पूछा।

सुनैना को कल रात की चोट याद आयी। सुनैना अस्पताल से बाहर भागी। वह उसी रुधिरपुर स्टेशन पर पहुँच गई जहां उसे वह बुढ़िया मिली थी। वहाँ जा कर चिल्लाने लगी, "अम्मा कहाँ हो तुम?""अम्मा कहाँ हो? अभी मेरे सामने आओ।"

स्टेशन पर कुछ लोगों ने उसकी तरफ़ देखा पर उसे पागल समझ कर अनदेखा कर दिया। जब बहुत चिल्लाने पर भी वह बुढ़िया नहीं आयी, तब सुनैना फिर वहीं बेंच पर बैठ कर रोने लग गई।

"मुझे क्या बुला रही है? तू तो ख़ुद अपनी इच्छा से यहाँ आई थी ना? क्या मिला यहाँ आ कर?"

सुनैना - "तुमने तो कहा था बीते कल में जा सकती हो। तो मुझे लगा -"

"क्या लगा? यही कि इतिहास बदलने से तेरा दुख दूर हो जायेगा?" - बुढ़िया ने कठोर स्वर में पूछा।

उसने आगे कहा - "यहाँ प्रकृति की महा-लीला चल रही है। तू कौन है? और यह सब लोग कौन हैं? यहाँ जन्म-मरण का खेल तो समय के शुरुआत से ही चला आ रहा है। यह घटनाएँ उसी महा-लीला का हिस्सा हैं। तू एक घटना से बचेगी तो दूसरी तुझ पर आ बरसेगी। जैसे इस महा-लीला में तुझे मुस्कुराहट मिलती है, वैसे ही पीड़ा भी मिलती है। प्रकृति घटनाएँ देती है… सुख या दुख तू ख़ुद चुनती है।"

"तो मैं अब क्या करूँ अम्मा?" - सुनैना ने रोते हुए कहा।

"अंदर झांक। वहीं पर ऐसा कुछ मिलेगा जो कभी नहीं बदलता। वह जो तेरे सारे दुख दूर कर देगा। जब तक जीवन है, तक तक इस महा-लीला की घटनाएँ हैं। इनके डर से जीवन जीना नहीं छोड़ देते। इनको स्वीकार कर और जा, अपना जीवन जी ले। चिंता छोड़ और उन्मुक्त हो जा। यही एक सूत्र है।" 

सुनैना के आंसू थम जाते हैं। वह चुपचाप अस्पताल की तरफ़ चल देती है। बीते हुए कल के प्रयास में उसने अपने आज में प्रवेश कर लिया था।


Saturday, 7 March 2026

विराट पराजय

 

उसे सुन कर विश्वास नहीं हुआ। यह संभव ही नहीं था। उसने फिर पूछा, "क्या सच में टीम में मेरा नाम नहीं है? पर गुलशन सर ने ख़ुद मेरी बोलिंग की तारीफ़ की थी"। उसने नोटिस बोर्ड दोबारा से पढ़ा - नतीजा वही। पूरे 15 खिलाड़ियों के नाम पढ़ डाला - पर नीरज दीक्षित का नाम नदारद था। टीम में उसका चयन नहीं हुआ था। वह पीछे बेंच पर बैठ गया। उसके दिमाग़ में बीसों विचार दौड़ने लगे। क्रिकेट को ले के पिताजी से बहस, रोज़ 5 बजे उठ कर प्रैक्टिस के लिए निकलना, गुलशन सर की सेवा में लगे रहना, परीक्षा में नंबर कम आना, कुछ दोस्तों के ताने, स्वयं की क्षमता पर प्रश्न - ऐसे शक्तिशाली भावों के बीच जैसे उसका मन बहा जा रहा था। यह कह पाना मुश्किल था कि वह कैसा महसूस कर रहा था। शायद वह सब कुछ महसूस कर रहा था, शायद कुछ भी नहीं।


अचानक से एक बालक उसके बग़ल में आ कर बैठ गया। यह दीपेश था। दीपेश की कीर्ति चहुँओर इस बात से फैली हुई थी कि वह ग़लत समय पर सही बात करता था। उसने नीरज के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "भई जो होता है अच्छे के लिये ही होता है।" नीरज की सांत्वना में ही कोई विशेष रुचि नहीं थी और यह तो फिर भी "ज्ञान" था। उसके मन में आया कि दीपेश के मुँह पर एक मुक्का दे मारे। लेकिन इस क्रोध और दुख के समय में भी उसने संयम बनाये रखा और दीपेश को अपनी तेज धारदार दृष्टि दिखा कर अपना मुँह फेर लिया। इस समय उसके लिए सबसे बड़ी समस्या थी अपने पिताजी का सामना करना। उन्होंने साफ़ साफ़ कहा था कि क्रिकेट में कोई भविष्य नहीं है और यह कि उसे पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देना चाहिए था। उस तीखी बहस के बाद आज टीम में चयन ना होना एक तरह का प्रमाण था कि उसके पिताजी सही थे। वह दीपेश को पूरी तरह अनदेखा कर अपने घर की और चल पड़ा। 


कहते हैं, समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है। पर दीपेश के लिये यह इशारा काफ़ी नहीं था। उसने नीरज से लगभग चिल्लाते हुए कहा - "शाम को चौरासिया चलेगा ना नीरज?"। नीरज अब तमतमा गया। उससे अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी घड़ी में कोई भी संवेदनशील व्यक्ति उससे ख़ान पान और मौज मस्ती के बारे पूछ भी कैसे सकता था। "अबे तू पैदाइशी बेवक़ूफ़ है या बाकायदा ट्रेनिंग ले कर इतना बेवक़ूफ़ बना है?" नीरज की भड़ास निकाल पड़ी। पर वह और कुछ नहीं बोला। सीधे घर को चला। दीपेश के साथ ऐसा पहले भी हो चुका था। वह आज तक समझ नहीं पाया था कि लोग उसके ऐसे सीधे सादे मासूम सवालों पर कभी कभी आग बबूला क्यों हो जाते हैं। यह कहना मुश्किल है कि यह बात दीपेश को परेशान करती थी या नहीं, क्योंकि सवाल पूछना तो उसने फिर भी जारी रखा था।


नीरज घर पहुँचा तो रोज़ के जैसा ही माहौल था। माँ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर टीवी सीरियल देखते हुए सब्ज़ी काट रहीं थीं। पिताजी अख़बार पढ़ रहे थे। भारतीय घरों पर कम से कम दो अध्ययन तो किए ही जा सकते हैं—पहला यह कि माताओं के जीवन में रसोई और भोजन से जुड़ी व्यस्तताएँ कितना विस्तार घेर लेती हैं, और जो समय शेष बचता है उसमें टीवी सीरियलों का कितना अधिकार होता है। दूसरा यह कि भारतीय पिता इतना अख़बार पढ़ने के बाद भी वास्तविक मुद्दों से इतने अनभिज्ञ कैसे रह जाते हैं।


ख़ैर, नीरज किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था। उसने चुपचाप जूते उतारे और अपने कमरे की तरफ़ चल दिया। अपने कमरे में घुसने को था कि तभी पिताजी ने पूछ डाला, "कल दीपेश मिला था। बता रहा था कि आज टीम की फाइनल लिस्ट निकलेगी। टीम में नाम आया या नहीं?"। मित्र मंडली में दीपेश जैसा साथी हो तो सारी खबरें सार्वजनिक हो ही जाती हैं। आज इसका शिकार नीरज था। नीरज ने कुछ कहा नहीं, बस ना में सिर हिला दिया। पिताजी ने भी कुछ कहा नहीं। बस अख़बार की ओर देख कर हल्का सा मुस्कुरा दिए। शायद उन्होंने अख़बार में कुछ मज़ाक़िया पढ़ लिया था। पर संभावना इसी की ज़्यादा है कि यह मुस्कुराहट कटाक्ष की कटार  थी, जो नीरज के हृदय में उतर गई। पिताजी डाँट लगा देते तो शायद उसे इतनी तकलीफ़ नहीं होती, लेकिन कटाक्ष तो एक असहनीय प्रहार की तरह था। संभवतः डाँट लगाने या लड़ लेने में भी किसी स्तर का सम्मान छुपा होता है जो कुटिल मुस्कान छीन लेती है। माँ टीवी देख रही थी। उनका ध्यान आकर्षित करने लायक़ ड्रामा यह बाप बेटे नहीं कर सकते थे। नीरज अपने बेडरूम में चला गया। 


शाम को पिताजी नीरज के कमरे में आये और उन्होंने कहा, "तुमने ठीक से जवाब नहीं दिया। टीम में सिलेक्शन नहीं हुआ क्या?"। अब तक नीरज का क्रोध उतर चुका था या यह कह लीजिए कि क्रोध अब अवसाद का रूप ले चुका था। उसने धीरे से कहा, "नहीं हुआ!"


पिताजी - "तो अब आगे का क्या प्लान है?"


नीरज - "क्या प्लान! जब स्कूल की टीम में सिलेक्शन नहीं हो रहा है तो आईपीएल या नेशनल टीम के लिए क्या ख़ाक होगा! कोई प्लान नहीं है।"


पिताजी - "तो मतलब क्रिकेट को अलविदा? प्रैक्टिस भी बंद?"


नीरज ने बहुत थोड़ा सा सिर हिलाया। अब तक उसमें इतना साहस नहीं आया था कि खुले तौर पर क्रिकेट को अलविदा कहना स्वीकार कर सके।


पिताजी - "अच्छा एक बात बताओ - वैसे तो तुमको सुबह उठाने में पूरे परिवार को मशक़्क़त करनी पड़ती है लेकिन क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए तो तुम ख़ुद ही 5 बजे उठ के, तैयार हो के निकल जाते थे। ऐसा क्यों?"


नीरज - "हाँ तो क्रिकेट खेलने में इतना मज़ा भी तो आता था। मैं तो रात को सोता भी यही सोच के था कि जल्दी से सुबह हो और मैं अपनी किट ले कर मैदान पहुँच जाऊँ। लेकिन जब असली मैच ही खेलने ना मिले तो प्रैक्टिस किस काम की?"


पिताजी - "तुम जब सो रहे थे तो मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गये। मुझे थियेटर का बहुत शौक़ था। पर तुम्हारे दादाजी को इसमें सिर्फ़ समय की बर्बादी दिखती थी। बहुत बार मुझे डाँट भी लगायी थी। लेकिन मुझे थियेटर इतना पसंद था कि मैं उनकी सुनता नहीं था। फिर एक बार नंबर कम आये तो उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया - थियेटर नहीं छोड़ा तो स्कूल ही छुड़वा दूँगा। जब पढ़ाई लिखाई ही चौपट है तो स्कूल भेजने का क्या फ़ायदा।"


नीरज - "फिर?"


पिताजी - "फिर क्या? पिताजी की बात माननी पड़ी। थियेटर छूट गया।"


नीरज - "वैसे सब कहते हैं कि थियेटर में पैसा नहीं है। थियेटर से बहुत कम लोग ही कुछ ढंग का कमा पाते हैं।"


पिताजी - "ठीक कहते हैं।"


नीरज - "तब तो दादाजी ने ठीक ही किया ना?"


पिताजी मुस्कुराए। इस बार मुस्कुराहट में कटाक्ष नहीं था। यह आपबीती घटना से जनित संवेदना थी। इसमें दुख था, पछतावा था और परिपक्वता भी थी। नीरज इन सब भावों को तो नहीं पढ़ पाया लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि इस मुस्कुराहट में कटाक्ष नहीं था।


पिताजी - "अक्सर माँ बाप अपने बच्चों का भला चाहते हैं। वह भला आम तौर पर सुरक्षा का रूप लेता है। यह ठीक ही है कि मेरे पिताजी ने मुझे एक सुरक्षित भविष्य की ओर धकेल दिया। थियेटर में शायद मैं हार जाता, लेकिन अब भी क्या इस जीवन को मैं जीत के रूप में देख सकता हूँ? क्या जीवन में सुरक्षा ही जीत है? मेरी बात ध्यान से सुनो नीरज - असल महत्व जीत या हार का नहीं होता। असल महत्व होता है कि जब हमने प्रयास किया तो क्या कुछ दांव पर लगाया। हम तो ऐसा नीरस जीवन जीते हैं, जिसका दायरा बहुत छोटा हो जाता है। चाहे हम जीतें या हारें - दोनों बहुत छोटे होते हैं। सच पूछो तो मेरी हार भी कोई हार थी? नीरज तुम जब भी प्रतिस्पर्धा में उतरो, जब भी लड़ो, जब भी प्रयास करो - तो अपना समूचा अस्तित्व झोंक दो। यह सब दिमाग़ में ना आये कि आईपीएल खेलूँगा या नहीं खेलूँगा। खेलो - और खूब जम कर खेलो। यह सच है कि इतने लगन से की गई प्रतिस्पर्धा में मिली हार बहुत पीड़ादायक होती है, लेकिन वह हार भी विराट होती है। उस हार में भी एक गहरा संतोष मिलता है। उसी संतोष से जीवन ऊर्जा बहती है। हम कुनकुना जीवन जीते हैं और हमें लगता है कि सब सही चल रहा है। पर वह असंतोष हमें कचोटता रहता है।"


पिताजी ने बहुत गहरी बातें कहीं थीं। यह कह लीजिए कि  कुछ शब्दों में अपने जीवन का सार कह डाला था। नीरज अवाक था। फिर थोड़ा रुक कर उसने पूछा - "कभी आपने सोचा है कि आप थियेटर जारी रखते तो क्या होता? क्या आपके ग्रुप से कोई बड़ा कलाकार निकला?"


पिताजी - "काफ़ी समय से नहीं सोचा था। आज तुम्हारे चलते सोचने लगा। वैसे मेरे उस ग्रुप से कोई ख़ास आगे नहीं निकला। लेकिन उनमें से कुछ लोगों ने बहुत अच्छा प्रयास किया। फिर बाद में लोगों ने अलग अलग रास्ते ले लिये। आज सब कुछ ना कुछ ठीक-ठाक कर रहे हैं। हमको जितना डर लगता है, जीवन उतना भयावह नहीं है। हो सकता है मैं भी थियेटर जारी रखता तो आज जितना पैसा है या जो स्थिरता है वो मेरे जीवन में नहीं होती, पर अगर मैंने वह विराट पराजय देखी होती तो आज यह असंतोष मुझे कचोटता नहीं रहता। ख़ैर अब क्या ही हो सकता है!"


नीरज ख़ुशी से दांत दिखाते हुए- "ठीक है! मैं कल भी क्रिकेट खेलने जाऊँगा"। "वैसे मेरे स्कूल में जो थियेटर ग्रुप है उसमें एक डायरेक्टर साहब आते हैं, उनका नंबर आपको ला कर दे दूँगा! आप बात कर लेना!"


पिताजी - "तुम समझते नहीं! अब या सब संभव नहीं! जो हुआ सो हुआ!"


नीरज - "अगर आप अपने ही दिये हुए लेक्चर पर अमल नहीं करेंगे तो मैं क्या ख़ाक करूँगा?"


पिताजी मौन हो गये। मना नहीं कर पाये। उनके पुत्र ने अकाट्य तर्क दिया था। पर मन में थियेटर को ले कर उत्साह उठा। नीरज भी चुप हो गया। समझ ही गया था तो आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं थी। पुरुषों की भावनात्मक अभिव्यक्ति मौन से ही होती है। स्त्री समाज को यह बात जँचती नहीं पर अब प्रकृति ने उन्हें ऐसा ही बनाया है तो कोई क्या कर सकता है।


स्त्री से याद आया - इस पूरे घटनाक्रम से अनभिज्ञ, नीरज की माँ परेशान थीं कि उनका बेटा बिना खाए ही सो गया। भारतीय परिवारों के बच्चे समय पर खा लें और समय पर पढ़ लें, तो उनकी माताएँ बड़ी शांति का अनुभव करेंगी। पर नीरज की माताजी को आज वह अनुभव उपलब्ध नहीं होना था। नीरज के बाहर आते ही बोलीं, "नीरज तू बिना खाए कैसे सो गया? चल बैठ अब खाना लगा देती हूँ।"


नीरज- "नहीं मम्मी! अभी चौरसिया जा रहा हूँ। दीपेश के साथ।"