Saturday, 7 March 2026

विराट पराजय

 

उसे सुन कर विश्वास नहीं हुआ। यह संभव ही नहीं था। उसने फिर पूछा, "क्या सच में टीम में मेरा नाम नहीं है? पर गुलशन सर ने ख़ुद मेरी बोलिंग की तारीफ़ की थी"। उसने नोटिस बोर्ड दोबारा से पढ़ा - नतीजा वही। पूरे 15 खिलाड़ियों के नाम पढ़ डाला - पर नीरज दीक्षित का नाम नदारद था। टीम में उसका चयन नहीं हुआ था। वह पीछे बेंच पर बैठ गया। उसके दिमाग़ में बीसों विचार दौड़ने लगे। क्रिकेट को ले के पिताजी से बहस, रोज़ 5 बजे उठ कर प्रैक्टिस के लिए निकलना, गुलशन सर की सेवा में लगे रहना, परीक्षा में नंबर कम आना, कुछ दोस्तों के ताने, स्वयं की क्षमता पर प्रश्न - ऐसे शक्तिशाली भावों के बीच जैसे उसका मन बहा जा रहा था। यह कह पाना मुश्किल था कि वह कैसा महसूस कर रहा था। शायद वह सब कुछ महसूस कर रहा था, शायद कुछ भी नहीं।


अचानक से एक बालक उसके बग़ल में आ कर बैठ गया। यह दीपेश था। दीपेश की कीर्ति चहुँओर इस बात से फैली हुई थी कि वह ग़लत समय पर सही बात करता था। उसने नीरज के कंधे पर हाथ रख कर कहा, "भई जो होता है अच्छे के लिये ही होता है।" नीरज की सांत्वना में ही कोई विशेष रुचि नहीं थी और यह तो फिर भी "ज्ञान" था। उसके मन में आया कि दीपेश के मुँह पर एक मुक्का दे मारे। लेकिन इस क्रोध और दुख के समय में भी उसने संयम बनाये रखा और दीपेश को अपनी तेज धारदार दृष्टि दिखा कर अपना मुँह फेर लिया। इस समय उसके लिए सबसे बड़ी समस्या थी अपने पिताजी का सामना करना। उन्होंने साफ़ साफ़ कहा था कि क्रिकेट में कोई भविष्य नहीं है और यह कि उसे पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देना चाहिए था। उस तीखी बहस के बाद आज टीम में चयन ना होना एक तरह का प्रमाण था कि उसके पिताजी सही थे। वह दीपेश को पूरी तरह अनदेखा कर अपने घर की और चल पड़ा। 


कहते हैं, समझदार के लिए इशारा काफ़ी होता है। पर दीपेश के लिये यह इशारा काफ़ी नहीं था। उसने नीरज से लगभग चिल्लाते हुए कहा - "शाम को चौरासिया चलेगा ना नीरज?"। नीरज अब तमतमा गया। उससे अब और बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी घड़ी में कोई भी संवेदनशील व्यक्ति उससे ख़ान पान और मौज मस्ती के बारे पूछ भी कैसे सकता था। "अबे तू पैदाइशी बेवक़ूफ़ है या बाकायदा ट्रेनिंग ले कर इतना बेवक़ूफ़ बना है?" नीरज की भड़ास निकाल पड़ी। पर वह और कुछ नहीं बोला। सीधे घर को चला। दीपेश के साथ ऐसा पहले भी हो चुका था। वह आज तक समझ नहीं पाया था कि लोग उसके ऐसे सीधे सादे मासूम सवालों पर कभी कभी आग बबूला क्यों हो जाते हैं। यह कहना मुश्किल है कि यह बात दीपेश को परेशान करती थी या नहीं, क्योंकि सवाल पूछना तो उसने फिर भी जारी रखा था।


नीरज घर पहुँचा तो रोज़ के जैसा ही माहौल था। माँ डाइनिंग टेबल पर बैठ कर टीवी सीरियल देखते हुए सब्ज़ी काट रहीं थीं। पिताजी अख़बार पढ़ रहे थे। भारतीय घरों पर कम से कम दो अध्ययन तो किए ही जा सकते हैं—पहला यह कि माताओं के जीवन में रसोई और भोजन से जुड़ी व्यस्तताएँ कितना विस्तार घेर लेती हैं, और जो समय शेष बचता है उसमें टीवी सीरियलों का कितना अधिकार होता है। दूसरा यह कि भारतीय पिता इतना अख़बार पढ़ने के बाद भी वास्तविक मुद्दों से इतने अनभिज्ञ कैसे रह जाते हैं।


ख़ैर, नीरज किसी से कोई बात करने के मूड में नहीं था। उसने चुपचाप जूते उतारे और अपने कमरे की तरफ़ चल दिया। अपने कमरे में घुसने को था कि तभी पिताजी ने पूछ डाला, "कल दीपेश मिला था। बता रहा था कि आज टीम की फाइनल लिस्ट निकलेगी। टीम में नाम आया या नहीं?"। मित्र मंडली में दीपेश जैसा साथी हो तो सारी खबरें सार्वजनिक हो ही जाती हैं। आज इसका शिकार नीरज था। नीरज ने कुछ कहा नहीं, बस ना में सिर हिला दिया। पिताजी ने भी कुछ कहा नहीं। बस अख़बार की ओर देख कर हल्का सा मुस्कुरा दिए। शायद उन्होंने अख़बार में कुछ मज़ाक़िया पढ़ लिया था। पर संभावना इसी की ज़्यादा है कि यह मुस्कुराहट कटाक्ष की कटार  थी, जो नीरज के हृदय में उतर गई। पिताजी डाँट लगा देते तो शायद उसे इतनी तकलीफ़ नहीं होती, लेकिन कटाक्ष तो एक असहनीय प्रहार की तरह था। संभवतः डाँट लगाने या लड़ लेने में भी किसी स्तर का सम्मान छुपा होता है जो कुटिल मुस्कान छीन लेती है। माँ टीवी देख रही थी। उनका ध्यान आकर्षित करने लायक़ ड्रामा यह बाप बेटे नहीं कर सकते थे। नीरज अपने बेडरूम में चला गया। 


शाम को पिताजी नीरज के कमरे में आये और उन्होंने कहा, "तुमने ठीक से जवाब नहीं दिया। टीम में सिलेक्शन नहीं हुआ क्या?"। अब तक नीरज का क्रोध उतर चुका था या यह कह लीजिए कि क्रोध अब अवसाद का रूप ले चुका था। उसने धीरे से कहा, "नहीं हुआ!"


पिताजी - "तो अब आगे का क्या प्लान है?"


नीरज - "क्या प्लान! जब स्कूल की टीम में सिलेक्शन नहीं हो रहा है तो आईपीएल या नेशनल टीम के लिए क्या ख़ाक होगा! कोई प्लान नहीं है।"


पिताजी - "तो मतलब क्रिकेट को अलविदा? प्रैक्टिस भी बंद?"


नीरज ने बहुत थोड़ा सा सिर हिलाया। अब तक उसमें इतना साहस नहीं आया था कि खुले तौर पर क्रिकेट को अलविदा कहना स्वीकार कर सके।


पिताजी - "अच्छा एक बात बताओ - वैसे तो तुमको सुबह उठाने में पूरे परिवार को मशक़्क़त करनी पड़ती है लेकिन क्रिकेट प्रैक्टिस के लिए तो तुम ख़ुद ही 5 बजे उठ के, तैयार हो के निकल जाते थे। ऐसा क्यों?"


नीरज - "हाँ तो क्रिकेट खेलने में इतना मज़ा भी तो आता था। मैं तो रात को सोता भी यही सोच के था कि जल्दी से सुबह हो और मैं अपनी किट ले कर मैदान पहुँच जाऊँ। लेकिन जब असली मैच ही खेलने ना मिले तो प्रैक्टिस किस काम की?"


पिताजी - "तुम जब सो रहे थे तो मुझे अपने स्कूल के दिन याद आ गये। मुझे थियेटर का बहुत शौक़ था। पर तुम्हारे दादाजी को इसमें सिर्फ़ समय की बर्बादी दिखती थी। बहुत बार मुझे डाँट भी लगायी थी। लेकिन मुझे थियेटर इतना पसंद था कि मैं उनकी सुनता नहीं था। फिर एक बार नंबर कम आये तो उन्होंने अल्टीमेटम दे दिया - थियेटर नहीं छोड़ा तो स्कूल ही छुड़वा दूँगा। जब पढ़ाई लिखाई ही चौपट है तो स्कूल भेजने का क्या फ़ायदा।"


नीरज - "फिर?"


पिताजी - "फिर क्या? पिताजी की बात माननी पड़ी। थियेटर छूट गया।"


नीरज - "वैसे सब कहते हैं कि थियेटर में पैसा नहीं है। थियेटर से बहुत कम लोग ही कुछ ढंग का कमा पाते हैं।"


पिताजी - "ठीक कहते हैं।"


नीरज - "तब तो दादाजी ने ठीक ही किया ना?"


पिताजी मुस्कुराए। इस बार मुस्कुराहट में कटाक्ष नहीं था। यह आपबीती घटना से जनित संवेदना थी। इसमें दुख था, पछतावा था और परिपक्वता भी थी। नीरज इन सब भावों को तो नहीं पढ़ पाया लेकिन इतना ज़रूर समझ गया कि इस मुस्कुराहट में कटाक्ष नहीं था।


पिताजी - "अक्सर माँ बाप अपने बच्चों का भला चाहते हैं। वह भला आम तौर पर सुरक्षा का रूप लेता है। यह ठीक ही है कि मेरे पिताजी ने मुझे एक सुरक्षित भविष्य की ओर धकेल दिया। थियेटर में शायद मैं हार जाता, लेकिन अब भी क्या इस जीवन को मैं जीत के रूप में देख सकता हूँ? क्या जीवन में सुरक्षा ही जीत है? मेरी बात ध्यान से सुनो नीरज - असल महत्व जीत या हार का नहीं होता। असल महत्व होता है कि जब हमने प्रयास किया तो क्या कुछ दांव पर लगाया। हम तो ऐसा नीरस जीवन जीते हैं, जिसका दायरा बहुत छोटा हो जाता है। चाहे हम जीतें या हारें - दोनों बहुत छोटे होते हैं। सच पूछो तो मेरी हार भी कोई हार थी? नीरज तुम जब भी प्रतिस्पर्धा में उतरो, जब भी लड़ो, जब भी प्रयास करो - तो अपना समूचा अस्तित्व झोंक दो। यह सब दिमाग़ में ना आये कि आईपीएल खेलूँगा या नहीं खेलूँगा। खेलो - और खूब जम कर खेलो। यह सच है कि इतने लगन से की गई प्रतिस्पर्धा में मिली हार बहुत पीड़ादायक होती है, लेकिन वह हार भी विराट होती है। उस हार में भी एक गहरा संतोष मिलता है। उसी संतोष से जीवन ऊर्जा बहती है। हम कुनकुना जीवन जीते हैं और हमें लगता है कि सब सही चल रहा है। पर वह असंतोष हमें कचोटता रहता है।"


पिताजी ने बहुत गहरी बातें कहीं थीं। यह कह लीजिए कि  कुछ शब्दों में अपने जीवन का सार कह डाला था। नीरज अवाक था। फिर थोड़ा रुक कर उसने पूछा - "कभी आपने सोचा है कि आप थियेटर जारी रखते तो क्या होता? क्या आपके ग्रुप से कोई बड़ा कलाकार निकला?"


पिताजी - "काफ़ी समय से नहीं सोचा था। आज तुम्हारे चलते सोचने लगा। वैसे मेरे उस ग्रुप से कोई ख़ास आगे नहीं निकला। लेकिन उनमें से कुछ लोगों ने बहुत अच्छा प्रयास किया। फिर बाद में लोगों ने अलग अलग रास्ते ले लिये। आज सब कुछ ना कुछ ठीक-ठाक कर रहे हैं। हमको जितना डर लगता है, जीवन उतना भयावह नहीं है। हो सकता है मैं भी थियेटर जारी रखता तो आज जितना पैसा है या जो स्थिरता है वो मेरे जीवन में नहीं होती, पर अगर मैंने वह विराट पराजय देखी होती तो आज यह असंतोष मुझे कचोटता नहीं रहता। ख़ैर अब क्या ही हो सकता है!"


नीरज ख़ुशी से दांत दिखाते हुए- "ठीक है! मैं कल भी क्रिकेट खेलने जाऊँगा"। "वैसे मेरे स्कूल में जो थियेटर ग्रुप है उसमें एक डायरेक्टर साहब आते हैं, उनका नंबर आपको ला कर दे दूँगा! आप बात कर लेना!"


पिताजी - "तुम समझते नहीं! अब या सब संभव नहीं! जो हुआ सो हुआ!"


नीरज - "अगर आप अपने ही दिये हुए लेक्चर पर अमल नहीं करेंगे तो मैं क्या ख़ाक करूँगा?"


पिताजी मौन हो गये। मना नहीं कर पाये। उनके पुत्र ने अकाट्य तर्क दिया था। पर मन में थियेटर को ले कर उत्साह उठा। नीरज भी चुप हो गया। समझ ही गया था तो आगे कुछ कहने की आवश्यकता नहीं थी। पुरुषों की भावनात्मक अभिव्यक्ति मौन से ही होती है। स्त्री समाज को यह बात जँचती नहीं पर अब प्रकृति ने उन्हें ऐसा ही बनाया है तो कोई क्या कर सकता है।


स्त्री से याद आया - इस पूरे घटनाक्रम से अनभिज्ञ, नीरज की माँ परेशान थीं कि उनका बेटा बिना खाए ही सो गया। भारतीय परिवारों के बच्चे समय पर खा लें और समय पर पढ़ लें, तो उनकी माताएँ बड़ी शांति का अनुभव करेंगी। पर नीरज की माताजी को आज वह अनुभव उपलब्ध नहीं होना था। नीरज के बाहर आते ही बोलीं, "नीरज तू बिना खाए कैसे सो गया? चल बैठ अब खाना लगा देती हूँ।"


नीरज- "नहीं मम्मी! अभी चौरसिया जा रहा हूँ। दीपेश के साथ।"





1 comment:

  1. Bahut hi shandar hai....Aksar hun jivan jite jite khud ko bhul jate hai...bhale hi hum kuchh pehlwanon mein har jaaye fir bhi try jarur karna chahie 🙂

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